शनिवार, जून 29, 2013

किताबी ज्ञान से योगाभ्यास कदापि नहीं ?

अष्टांग योग -जिसमे यम नियम आसन प्राणायाम मुद्रा बंध धारणा और ध्यान की विवेचना की गयी है ,एक ऐसी पद्धति है जिसे अपनाकर ब्यक्ति एक अकल्पनीय अनुभव  प्राप्त करने लगता है । प्रारम्भ में लोग योग को शारीरिक स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करने हेतु शुरू करते हैं ,परन्तु वे तब गौरवान्वित हो जाते हैं ,जब शनैः शनैः अनचाहे ही, अध्यात्म की दुनिया में पहुँच जाते हैं । लेकिन कोई भी ब्यक्ति यह कदापि न समझे कि वह महज किताबी ज्ञान से ऐसी उपलब्धि प्राप्त कर लेगा ?हो सकता है की किताबी ज्ञान द्वारा वह कुछ यात्रा पूरी कर ले ,परन्तु आगे चलकर वह मानसिक विकारों का शिकार भी हो सकता है । अतः आष्टांग की योग पद्धति किसी जानकार और निपुण ब्यक्ति के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए ।

यदि आपने अष्टांग योग की शिक्षा किसी ब्रह्मज्ञानी गुरु से प्राप्त की है तो समझिये की यह सोने में सुहागा का काम करेगा ?आपको यह पता भी नहीं चलेगा की आप कहाँ से कहां पहुँच चुके हैं ,क्योंकि आपका गुरु अदृश्य रूप से आपसे जुड़कर आपको ऐसी अनुभूति करा देगा जिसकी आप स्वप्न में भी कल्पना नहीं किये होंगे ।
अतः बेहतर तो यही होगा कि आप आष्टांग योग की शुरुवात किसी ब्रह्मज्ञानी गुरु के माध्यम से करें ।ऐसा करने के लिए ,यह भी आवश्यक नहीं कि आप हमेशा उनके सानिध्य में ही रहें । यदि आपने किसी ब्रह्मज्ञानी
गुरु से दीक्षा ली है तो आप कहीं भी रहेंगे ,आपके गुरु का मार्गदर्शन अदृश्य रूप से आपको मिलता रहेगा ?

 अतः मेरा तो यही सुझाव कि कोई भी ब्यक्ति किताबी ज्ञान से योगाभ्यास न करे ,अन्यथा उसे लाभ की जगह नुकसान भी हो सकता है ।

हरिः ॐ तत्सत ।