मंगलवार, मई 20, 2014

मन को नियंत्रित कैसे करें ?

अक्सर यह देखा जाता है क़ि इन्सान यदि किसी से हार मानता है तो वह अपने मन से ही हार मानता है और यह मन जो है किसी के बस में रहता ही नहीं ?आपने गीता में भी इसका उदाहरण देख लिया है !अर्जुन एक अपराजेय योद्धा था बड़े से बड़े शूरबीर भी उसके गाण्डीवं धनुष के आगे नतमस्तक हो जाते थे लेकिन वह खुद मन के आगे नतमस्तक था !उसने महाभारत की युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण से कहा था कि प्रभु यह जो मेरा मन है वह वायु से भी चञ्चल है और उसपर मैं नियंत्रण नहीं कर पा रहा हूं अब आप ही बताइये कि इसपर मैं नियंत्रण कैसे करूँ ?तब श्रीकृष्ण ने उससे कहा था कि अर्जुन मनपर नियंत्रण पाने का केवल दो ही उपाय हैं - ये हैं अभ्यास और बैराग्य !मन को बारबार नियंत्रित करने की कोशिश निरंतर जारी रखना चाहिए और मन जो चाहे उससे बिरक्त रहना चाहिए और इस तरह वह धीरे धीरे बस में हो जाता है ,परन्तु इसकी अभ्यास लगातार एवं लम्बे काल तक करना आवश्यक है !योग में इसे साक्छी भाव का अभ्यास  कहा जाता है !
बड़े बड़े संत अभ्यास और बैराग्य की इस प्रक्रिया को लगातार अभ्यास करते हुए ही एकदिन उसपर विजय पाते हैं और अगर आपने एकबार यदि मनको जीत लिया तो फिर समझिए की आपने जीवन की सारी समस्या पर विजय पा लिया !पर यह इतना साधारण काम नहीं है ! अक्सर होता तो यही है कि जैसे ही आप इसकी अभ्यास शुरू करते हैं आपका मन और दुगने ताकत से आपको मजबूर करता है और आपकी साधना धरी की धरी रह जाती है आपकी सारी कोशिश रफूचक्कर हो जाती है और आप अपने अभियान में असफल हो जाते हैं !
भाइयों मैं आपसे यही कहना चाहता हूँ की यह  अत्यधिक दुष्कर है इसके लिए अनेक जन्मों तक प्रयास करके ही संत उस स्थिति में पहुँच पाते हैं जहां पहुँचने के बाद और किसी भी बात की कमी नहीं रहती ?आप दूसरे शब्दों में इसे आदमी का अंतिम लक्छ्य भी कह सकते हैं !
हरि ॐ तत्सत् !