शनिवार, अप्रैल 20, 2013

परिस्थितियां परम्पराओं को प्रभावित करती हैं

 काफी लम्बे समय तक किसी नियम विशेष का अनुकरण ही परम्परा बन जाती है । जैसे शादिव्याह ,
मृतक कर्म,उपनयन संस्कार आदि आदि । ये परम्पराएं देश ,भाषा और धर्मं के अनुसार ही बंटे हुये हैं ।
हिन्दू परम्परा और मुस्लिम परम्पराएं अलग अलग होती हैं । एक देश की परम्परा जरुरी नहीं कि
दुसरे देश की परम्परा से मेल खाती हो ।

परम्पराओं पर देश ,काल और परीस्थिति का असर जरुर पड़ता है और इसी कारण परम्पराओं का स्वरुप
भी बदल जाता है । इसे हम एक उदहारण से समझ सकते हैं । हिन्दू धर्म में मृतक संस्कार करने का एक
अलग ही परम्परा है । लोग मृतक को पिंडदान करके और स्नान करके पांत में घर वापस लौटते हैं ,जो
कि आदिकाल से चला आ रहा है । परन्तु परिस्थिति इसे कैसे प्रभावित करती है इसे देखिये । पहले
लोग नदी, तालाब ,झरना आदि के करीब बसते थे और वहीँ पर पिंडदान आदि आसानी से हो जाते थे ,
लेकिन आज गाँव में तो यह संभव है ,परन्तु शहरों में यह परम्परा परिस्थिवश बदलती जा रही है ।
शहर में ना तो पांत में चलना संभव है ना ही पिंडदान कर पाना ,क्योंकि यहाँ तालाब अथवा नदी नहीं
मिलते और अगर हों भी पानी का अभाव रहता है । परिस्थिति ने यहीं पर परम्परा को बदल कर
रख दिया ।

इसी तरह पुराने ज़माने में शादीब्याह तय करना मांबाप या घर के बड़े बूढों का काम माना जाता था ।
वे अच्छे कुल ,गोत्र एवं परिवार को देख परख कर विवाह निश्चित करते थे और इसी कारण बर बधू
एक दुसरे को देख भी नहीं पाते थे जिसकी वजह से शादियाँ जीवन पर्यन्त निभते थे । लेकिन आज
आप किसी भी समाज को देख सकते हैं ,आज शादियां लड़के और लड़की की रजामंदी के बाद ही
तय हो पाते हैं । उनका कहना होता है कि मेरी शादी मेरी मर्जी के बगैर न की जावे । लेकिन देखने
में आता है कि ऐसी शादियां टिकाऊ नहीं होती । बहुत कम अन्तराल में ही पति पत्नी तलाक ले
लेते हैं । इधर परम्परा टूटी और उधर शादी भी टूट गई ।

मेरे कहने का आशय यही है कि परम्पराएं भी तभी तक कायम रहती हैं जब तक उसमें परिस्थिति की
मार नहीं पड़ती । परिस्थिति की मार परम्पराओं को जरूर प्रभावित करती हैं ।

हरिः ॐ तत्सत । 
 

जीवन एक पाठशाला है ?

मनुष्य का जीवन एक पाठशाला है ,जहां उसके जन्म के साथ ,कुछ न कुछ सीखने का जो क्रम शुरू होता है ,
वह निरंतर उसके अवसान तक चलते रहता है । फिर भी उसे लगता है कि वह किसी भी विषय में पारंगत नहीं
हो पाया है । और आधा अधूरा छोड़कर ,उसे नई शुरुवात करने वापस लौट जाना पड़ता है । अंतिम समय
तक उसकी यही इच्छा बरक़रार रहती है कि यदि समय मिलता तो ,वह कुछ और अनुभव प्राप्त कर लेता ,लेकिन समय है कि किसी का इंतजार नहीं करता ?

सही मायने में यदि हम सोंचे तो सबको यही अनुभव होगा कि उसने जीवन में बहुत सारी गलतियां की हैं
और बाद में वह उसमे सुधार लाने का प्रयास भी किया है ,लेकिन फिर भी उसमें पारंगत नहीं हो सका ।
भूल और सुधार का यह क्रम जीवन में निरंतर चलता रहता है । लोग यह भी कहने से नहीं चुकते कि
घुड़सवार ही घोड़े से गिरता है और जिसने गिर जाने के डर से घोड़े की सवारी ही नहीं की ,उसे घुड़सवारी
का आनंद ही कैसे मिलता ?

इसी तरह एक मुहावरा जीवन में और भी सार्थक होता है । कहते हैं कि जब दांत है तब चना नहीं और
जब चना है तब दांत नहीं ?जीवन में आदमी को इसका सही अनुभव मिलता है । जीवन पर्यन्त आदमी ,
दिन रात मेहनत करके ज्यादा से ज्यादा धन अर्जित करता है ,और फिर परिवार को उनके
जीवकोपार्जन का जरिया दिलाने में मदद करता है, बाल बच्चों की पढाई लिखाई ,शादी ब्याह और फिर
नौकरी आदि दिलाने में अपना पूरा जीवन बिता देता है और सोचता है कि जिम्मेदारियां खत्म होने
के बाद आराम की जिंदगी बिताएगा ,तीर्थाटन करेगा और जीवन की अपूर्ण इच्छाओं को पूरा करेगा ,
लेकिन होता यही है कि तब तक उसका शरीर जवाब देने लगता है । भोजन भी ठीक से नहीं कर पाता ,
क्योंकि यातो उसके दांत गायब हो चुके हैं ,या फिर भोजन की हाजमा शक्ति उसमें नहीं रही अथवा
कई बीमारियां आ घिरी हैं जिसके चलते वह हरदम परेशान रहता है या फिर उसकी धर्मपत्नी का स्वास्थ्य
ख़राब रहता है जिसे छोड़कर घर से बाहर जाना संभव नहीं । इसी तरह तीर्थाटन की इच्छा तो है
पर शरीर में शक्ति नहीं है कि वह चल फिर सके और घर से बाहर निकल सके ।

अतः कहने का आशय यह है कि किसी भी कार्य को भविष्य के लिए टालना ही पहली गलती है ,हर काम के लिए
समय निर्धारित होता है और यदि समय टल गया तो समझो वह हमेशा के लिए टल गया । जीवन में
यदि हमने इस सच्चाई को जान लिया तो हमने सही मायने में जीवन जी लिया ?

हरिः ॐ तत्सत ।