सोमवार, जुलाई 01, 2013

स्वस्थ रहना है तो दिनचर्या नियमित करें ?

यदि आपने अपने दिनचर्या को समय से बांध लिया तो समझिये आपने स्वस्थ रहने की गारंटी पा ली है । अक्सर लोगों की शिकायत रहती है कि उनकी तबियत ख़राब रहती है और उन्हें बार बार डाक्टर के पास जाना पड़ता है और डाक्टर उन्हें अनेक प्रकार की गोलियां दे देते हैं । इस तरह उन्हें काफी पैसे खर्च करने पड़ते हैं । किसी को एसिडिटी रहती है तो किसी को खांसी जुकाम और किसी को सिर में दर्द ?

हमारे एक मित्र ने जब मुझसे इस तरह की शिकायत की तो मैंने उनसे पूछ लिया कि आप कृपया यह बतावें कि क्या दिनचर्या में नियमित हैं ?अर्थात क्या आप समय से खाते ,समय से सोते और समय से जागते हैं ?जानते हैं कि इस पर उन्होंने क्या कहा -उन्होंने कहा समय से खाने आदि से क्या होता है । मैं जीवन में कभी भी समय से बंधना नहीं चाहता । जब मर्जी होती है खाता हूँ ,जब मरजी होती है सोता हूँ और जब मर्जी होती है जागता हूँ । तब मैंने कह दिया कि इसी के कारण आपको डाक्टर के पास अक्सर जाना पड़ता है और आपकी तबियत ख़राब रहती है । मैंने उन्हें यह सुझाव दिया कि कम से कम एक सप्ताह के लिये आप खाने सोने और जागने में नियमितता लाकर तो देखिये -आपकी स्वास्थ्य सम्बन्धी सभी समस्याएं दूर हो जावेंगी और दवाई का खर्च भी बच जावेगा ?

आप यकीन मानें -मेरे मित्र ने अनमने से मेरी बात मान ली और सचमुच उनकी स्वास्थ्य संबंधी सारी समस्याएँ समाप्त हो गयी । अब वे न तो डाक्टर का चक्कर लगाते हैं और न दवाई के लिए पैसे ही खर्च करते हैं।मित्रों !जब प्रकृति ने अपना नियम बना रखा है तो आपको जीवन में नियमित होने में क्यों परेशानी होनी चाहिये ,यदि आप अपना खानपान आदि को बांध लेंगे तो स्वास्थ्य भी अपने आपसे बंध जावेगा ?

हरिः ॐ तत्सत ।
 

शनिवार, जून 29, 2013

किताबी ज्ञान से योगाभ्यास कदापि नहीं ?

अष्टांग योग -जिसमे यम नियम आसन प्राणायाम मुद्रा बंध धारणा और ध्यान की विवेचना की गयी है ,एक ऐसी पद्धति है जिसे अपनाकर ब्यक्ति एक अकल्पनीय अनुभव  प्राप्त करने लगता है । प्रारम्भ में लोग योग को शारीरिक स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करने हेतु शुरू करते हैं ,परन्तु वे तब गौरवान्वित हो जाते हैं ,जब शनैः शनैः अनचाहे ही, अध्यात्म की दुनिया में पहुँच जाते हैं । लेकिन कोई भी ब्यक्ति यह कदापि न समझे कि वह महज किताबी ज्ञान से ऐसी उपलब्धि प्राप्त कर लेगा ?हो सकता है की किताबी ज्ञान द्वारा वह कुछ यात्रा पूरी कर ले ,परन्तु आगे चलकर वह मानसिक विकारों का शिकार भी हो सकता है । अतः आष्टांग की योग पद्धति किसी जानकार और निपुण ब्यक्ति के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए ।

यदि आपने अष्टांग योग की शिक्षा किसी ब्रह्मज्ञानी गुरु से प्राप्त की है तो समझिये की यह सोने में सुहागा का काम करेगा ?आपको यह पता भी नहीं चलेगा की आप कहाँ से कहां पहुँच चुके हैं ,क्योंकि आपका गुरु अदृश्य रूप से आपसे जुड़कर आपको ऐसी अनुभूति करा देगा जिसकी आप स्वप्न में भी कल्पना नहीं किये होंगे ।
अतः बेहतर तो यही होगा कि आप आष्टांग योग की शुरुवात किसी ब्रह्मज्ञानी गुरु के माध्यम से करें ।ऐसा करने के लिए ,यह भी आवश्यक नहीं कि आप हमेशा उनके सानिध्य में ही रहें । यदि आपने किसी ब्रह्मज्ञानी
गुरु से दीक्षा ली है तो आप कहीं भी रहेंगे ,आपके गुरु का मार्गदर्शन अदृश्य रूप से आपको मिलता रहेगा ?

 अतः मेरा तो यही सुझाव कि कोई भी ब्यक्ति किताबी ज्ञान से योगाभ्यास न करे ,अन्यथा उसे लाभ की जगह नुकसान भी हो सकता है ।

हरिः ॐ तत्सत । 

रविवार, मई 05, 2013

काहू काहू में मगन - काहू काहू में

यह माना जाता है कि मनुष्य 'चौरासी लाख योनि 'का भ्रमण करते हुये अंत में मनुष्य योनि में जन्म लेता है ।
और यह भी मान्यता है कि मनुष्य योनि में जन्म लेने के लिये देवता भी लालायित रहते हैं । फिरभी हम
मनुष्य के रूप में जन्म लेकर भी इस अमूल्य अवसर को फिजूल ही गवां देते हैं । मनुष्य योनि में जन्म लेने का
हम फायदा नहीं उठा पाते ?और अन्त में पुनः 'चौरासी लाख योनि' का चक्कर लगाने हम वापस लौट जाते हैं ।

कहा यह भी जाता है कि विवेक शक्ति और किसी अन्य  योनि के जीव जंतुओं में नहीं होती,यह केवल मनुष्यों
को ही मिली है । पशु पक्षी या किसी अन्य योनि के प्राणी ,मात्र पेट भरने के लिये ही दिनरात भटकते रहते हैं उन्हें और किसी अन्य कार्य से न तो कोई मतलब है और न ही उन्हें इसकी फ़िक्र ,क्योंकि उनमें विवेकशक्ति
है ही नहीं । और विवेकशक्ति के होते हुये भी इन्शान उसका उपयोग न करे यह एक सोचनीय विषय है ।

कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो घूम घूम कर पूरे धार्मिक स्थलों का भ्रमण कर डालते हैं और सोचते हैं कि वे
पापमुक्त हो गये हैं ?लेकिन जैसे ही वे तीर्थस्थल से वापस आते हैं ,फिरसे पापकर्म में लग जाते हैं । मांसाहार ,जुवा ,ब्यभिचार ,एवम गलत कमाई करने से नहीं चूकते ?उन्हें देखकर उनपर बड़ा तरस आता है
और कहना पड़ता है कि काश वह अपने दुष्कर्मों से मुक्त हो जाता तो उसकी भी सद्गति हो जाती ?

मेरे कहने का आशय यह है कि मनुष्य को परमात्मा ने विवेकशक्ति जो दी है उसका वे  सदुपयोग नहीं
करके दुरूपयोग करते हैं और अपने अगले जन्म को बिगाड़ डालते हैं ?ऐसे लोग अपने विवेक का जिस तरह से
उपयोग करते हैं उस पर तरस आना स्वाभाविक है ?लेकिन यह भी सही है कि ऐसे लोग अनजाने ही ऐसा
नहीं करते । इनका कथन होता है कि यदि बार बार मनुष्य नहीं बनना है तो फिर इस जन्म को क्यों
न तरीके से जिया जावे ?मानो वे यही कहना चाहते हैं कि इन्द्रियां केवल भरपूर उपयोग के लिए ही है ,अतः
उसका भरपूर उपयोग करना चाहिए ?

हरिः ॐ तत्सत । 

रविवार, अप्रैल 28, 2013

मन के हारे हार है मन के जीते जीत

कहा गया है ,'खाली दिमाग शैतान का घर होता है ',अतः कभी भी दिमाग को खाली नहीं रखना चाहिये ।
कहीं न कहीं ,किसी भी काम में इसे ब्यस्त रखना चाहिए तभी इसे नियंत्रित किया जा सकता है । योग में भी
दिमाग को नियंत्रित करने हेतु जो उपाय बताये गए हैं ,उससे भी हम इसी निष्कर्ष में पहुंचते हैं कि दिमाग को
भटकने नहीं देना चाहिए ।

योग में एक क्रिया है 'योगनिद्रा 'की । इस क्रिया में हम मन को अपने अनुसार ब्यस्त रखते हैं और मन को नियंत्रित करते हैं । यदि हम मन के द्वारा नियंत्रित हो गए तो बहुत सारी गलतियाँ या अपराध होना निश्चित है। योग में दुसरा उपाय है 'मंत्र जाप 'का । यदि आपके पास समय है और मन को नियंत्रित करना है तो आप
ध्यान के किसी आसन में बैठ जाइये और अपने गुरुमंत्र का जाप कीजिये अथवा किसी भी अन्य मंत्र का जाप कीजिये ,आपका मन एकाग्र होकर तुरन्त नियंत्रित हो जायेगा ।

मन बहुत ही शक्तिशाली होता है । इसीलिये एक मुहावरा यह भी कहा जाता है ,'मन के हारे हार है मन के जीते जीत। 'आपने भी अनुभव किया होगा कि यदि हमारा मन  प्रारम्भ में ही हार  मान लेता है तो फ़िर हम किसी भी
 काम में सफलता हासिल नहीं कर सकते और इसके विपरीत यदि हमने मन में ठान लिया कि अमुक काम
को करना है तो हम कठिन से कठिन काम को भी आसानी से पूरा कर लेते हैं ।

अधिकांश समय हम मन के द्वारा ही संचालित रहते हैं ,लेकिन साधु संत ,जिन्होंने मन को जीत लिया है
कभी भी मन के द्वारा नियंत्रित नहीं रहते ,अपितु वे स्वतः मन को नियंत्रित रखते हैं और तभी वे एक ऐसी स्थिति में पहुँच जाते हैं ,जहाँ वे किसी भी परिस्थिति में जीने में सक्षम होते हैं ।

अतः मेरा आप सबों से निवेदन है कि आप भी मन को नियंत्रित करने का मार्ग जरुर अपनाएँ ।
ये साधनायें कठिन जरुर है लेकिन असंभव नहीं ।

हरिः ॐ तत्सत ।  

शनिवार, अप्रैल 20, 2013

परिस्थितियां परम्पराओं को प्रभावित करती हैं

 काफी लम्बे समय तक किसी नियम विशेष का अनुकरण ही परम्परा बन जाती है । जैसे शादिव्याह ,
मृतक कर्म,उपनयन संस्कार आदि आदि । ये परम्पराएं देश ,भाषा और धर्मं के अनुसार ही बंटे हुये हैं ।
हिन्दू परम्परा और मुस्लिम परम्पराएं अलग अलग होती हैं । एक देश की परम्परा जरुरी नहीं कि
दुसरे देश की परम्परा से मेल खाती हो ।

परम्पराओं पर देश ,काल और परीस्थिति का असर जरुर पड़ता है और इसी कारण परम्पराओं का स्वरुप
भी बदल जाता है । इसे हम एक उदहारण से समझ सकते हैं । हिन्दू धर्म में मृतक संस्कार करने का एक
अलग ही परम्परा है । लोग मृतक को पिंडदान करके और स्नान करके पांत में घर वापस लौटते हैं ,जो
कि आदिकाल से चला आ रहा है । परन्तु परिस्थिति इसे कैसे प्रभावित करती है इसे देखिये । पहले
लोग नदी, तालाब ,झरना आदि के करीब बसते थे और वहीँ पर पिंडदान आदि आसानी से हो जाते थे ,
लेकिन आज गाँव में तो यह संभव है ,परन्तु शहरों में यह परम्परा परिस्थिवश बदलती जा रही है ।
शहर में ना तो पांत में चलना संभव है ना ही पिंडदान कर पाना ,क्योंकि यहाँ तालाब अथवा नदी नहीं
मिलते और अगर हों भी पानी का अभाव रहता है । परिस्थिति ने यहीं पर परम्परा को बदल कर
रख दिया ।

इसी तरह पुराने ज़माने में शादीब्याह तय करना मांबाप या घर के बड़े बूढों का काम माना जाता था ।
वे अच्छे कुल ,गोत्र एवं परिवार को देख परख कर विवाह निश्चित करते थे और इसी कारण बर बधू
एक दुसरे को देख भी नहीं पाते थे जिसकी वजह से शादियाँ जीवन पर्यन्त निभते थे । लेकिन आज
आप किसी भी समाज को देख सकते हैं ,आज शादियां लड़के और लड़की की रजामंदी के बाद ही
तय हो पाते हैं । उनका कहना होता है कि मेरी शादी मेरी मर्जी के बगैर न की जावे । लेकिन देखने
में आता है कि ऐसी शादियां टिकाऊ नहीं होती । बहुत कम अन्तराल में ही पति पत्नी तलाक ले
लेते हैं । इधर परम्परा टूटी और उधर शादी भी टूट गई ।

मेरे कहने का आशय यही है कि परम्पराएं भी तभी तक कायम रहती हैं जब तक उसमें परिस्थिति की
मार नहीं पड़ती । परिस्थिति की मार परम्पराओं को जरूर प्रभावित करती हैं ।

हरिः ॐ तत्सत । 
 

जीवन एक पाठशाला है ?

मनुष्य का जीवन एक पाठशाला है ,जहां उसके जन्म के साथ ,कुछ न कुछ सीखने का जो क्रम शुरू होता है ,
वह निरंतर उसके अवसान तक चलते रहता है । फिर भी उसे लगता है कि वह किसी भी विषय में पारंगत नहीं
हो पाया है । और आधा अधूरा छोड़कर ,उसे नई शुरुवात करने वापस लौट जाना पड़ता है । अंतिम समय
तक उसकी यही इच्छा बरक़रार रहती है कि यदि समय मिलता तो ,वह कुछ और अनुभव प्राप्त कर लेता ,लेकिन समय है कि किसी का इंतजार नहीं करता ?

सही मायने में यदि हम सोंचे तो सबको यही अनुभव होगा कि उसने जीवन में बहुत सारी गलतियां की हैं
और बाद में वह उसमे सुधार लाने का प्रयास भी किया है ,लेकिन फिर भी उसमें पारंगत नहीं हो सका ।
भूल और सुधार का यह क्रम जीवन में निरंतर चलता रहता है । लोग यह भी कहने से नहीं चुकते कि
घुड़सवार ही घोड़े से गिरता है और जिसने गिर जाने के डर से घोड़े की सवारी ही नहीं की ,उसे घुड़सवारी
का आनंद ही कैसे मिलता ?

इसी तरह एक मुहावरा जीवन में और भी सार्थक होता है । कहते हैं कि जब दांत है तब चना नहीं और
जब चना है तब दांत नहीं ?जीवन में आदमी को इसका सही अनुभव मिलता है । जीवन पर्यन्त आदमी ,
दिन रात मेहनत करके ज्यादा से ज्यादा धन अर्जित करता है ,और फिर परिवार को उनके
जीवकोपार्जन का जरिया दिलाने में मदद करता है, बाल बच्चों की पढाई लिखाई ,शादी ब्याह और फिर
नौकरी आदि दिलाने में अपना पूरा जीवन बिता देता है और सोचता है कि जिम्मेदारियां खत्म होने
के बाद आराम की जिंदगी बिताएगा ,तीर्थाटन करेगा और जीवन की अपूर्ण इच्छाओं को पूरा करेगा ,
लेकिन होता यही है कि तब तक उसका शरीर जवाब देने लगता है । भोजन भी ठीक से नहीं कर पाता ,
क्योंकि यातो उसके दांत गायब हो चुके हैं ,या फिर भोजन की हाजमा शक्ति उसमें नहीं रही अथवा
कई बीमारियां आ घिरी हैं जिसके चलते वह हरदम परेशान रहता है या फिर उसकी धर्मपत्नी का स्वास्थ्य
ख़राब रहता है जिसे छोड़कर घर से बाहर जाना संभव नहीं । इसी तरह तीर्थाटन की इच्छा तो है
पर शरीर में शक्ति नहीं है कि वह चल फिर सके और घर से बाहर निकल सके ।

अतः कहने का आशय यह है कि किसी भी कार्य को भविष्य के लिए टालना ही पहली गलती है ,हर काम के लिए
समय निर्धारित होता है और यदि समय टल गया तो समझो वह हमेशा के लिए टल गया । जीवन में
यदि हमने इस सच्चाई को जान लिया तो हमने सही मायने में जीवन जी लिया ?

हरिः ॐ तत्सत ।
 

शनिवार, अप्रैल 13, 2013

समय से पहले और भाग्य से ज्यादा कुछ नहीं मिलता ?

कुछ लोग वाहवाही लूटते हैं कि मैंने ऐसा किया वैसा किया और कुछ लोग इसके विपरीत यह रोना रोते हैं कि मैंने इतना ज्यादा मेहनत किया फिरभी मुझे कुछ हासिल नहीं हो सका ?यही मानव प्रवृत्ति है कि यदि सफलता मिली तो वह स्वतः की मेहनत से अर्जित बताता है ,और यदि असफलता मिली तो कहता फिरता है कि क्या करूं मेहनत तो बहुत किया था पर भाग्य में नहीं था । लेकिन एक बात आप गांठ बांध लें ,वह यह कि
किसी को भी समय से पहले और भाग्य से ज्यादा कुछ मिल भी नहीं सकता ।
ज्योतिष विद्या पर भारतीय लोगों का विश्वास हमेशा से रहा है ,और यही कारण है कि जहाँ लोग शादी -ब्याह ,ब्यापार ब्यवसाय के लिये सही समय याने ग्रहदशा का इंतजार करते हैं वहीँ यात्रा करने ,मकान निर्माण
आदि अनेकों शुभ कार्य करने के लिए ,ज्योतिष का सहारा लेना नहीं भूलते । आखिर यह ग्रहदशा होती क्या है ?
ग्रहदशा कि मिलान से यही जानकारी होती है कि समय ठीक चल रहा है या नहीं । या फिर ग्रहदशा पक्ष
समर्थक है या नहीं । और आप निश्चित मानिये कि इसका जातक पर याने मनुष्य पर असर जरुर पड़ता है ।
आप भी जीवन में ऐसे अनेक अनुभव किये होंगे कि कभी कोई काम बिना किसी खास मेहनत के निपट जाते
हैं तो कभी कड़ी मेहनत करने के बाद भी अटक जाते हैं । अक्सर ग्रहदशा का असर आदमी के ब्यवसाय
शादी -ब्याह ,संपत्ति तथा स्वास्थ्य आदि पर विशेषरूप से प्रभावकारी होता है । कहा भी गया है कि जब
लोहा गरम हो तभी हथौड़ा मारना चाहिए अन्यथा नहीं ।
हमारे एक मित्र हैं ,कहते हैं कि मुझे भाग्य पर भरोसा नहीं है । मैं तो केवल मेहनत पर भरोसा करता हूँ ।
भाई साहब ,सही समय के चलते ही आप ऐसी बात करते हैं ,यदि समय विपरीत होता ,कड़ी मेहनत करने पर भी सफलता नहीं मिलती तो आप भी भाग्यवादी होते ?लेकिन भाग्य के साथ साथ मेहनत को नकारना भी
उचित नहीं ।

मेरा कहने का आशय केवल यही है कि सबको उचित समय का इंतजार करना आवश्यक होता है ।
और यह बात तो कभी करना ही नहीं चाहिए कि जो कुछ किया है मैंने किया है । आप या हम कुछ करने
 वाले कौन होते हैं । जो भी होता है वह पूर्व निर्धारित होता है ,और वही हमारी नियति होती है ।

हरिः ॐ तत्सत । 

  

रविवार, अप्रैल 07, 2013

अनचाहे सीख देना उचित नहीं ?

एक जमाना था कि जब बड़े बूढों की सीख को महत्व मिलता था । लोग किसी भी समस्या की निदान के लिए उनके पास जाकर सलाह लेते थे । बुजुर्ग आदमी भी अपने अनुभव के आधार पर नयी पीढ़ी को सलाह दिया करते थे , जिसे मान्यता भी मिलती थी । बिना चाहे भी कई बार वे नयी पीढ़ी को किसी काम को करने अथवा न करने की सलाह वे दिया करते थे , जिसको नयी पीढ़ी सिरोधार्य करके , उसे दिशानिर्देश मान लेते थे । परन्तु आज कलियुग अपनी चरम सीमा की ओर लगातार अग्रसर हो रहा है । और समय भी द्रुत गति से बदलता जा रहा है । आज आप अक्सर देखेंगे कि बड़े बूढों की सलाह को कोई अहमियत नहीं देता । चाहे वह किसी परिवार विशेष की बात हो अथवा समाज या राष्ट्र की । आज युवातुर्क उलटे बड़े बूढों को सीख देते नजर आवेंगे । यदि किसी बुजुर्ग ब्यक्ति ने अनचाहे सलाह देनेकी हिम्मत  की तो तुरंत नयी पीढ़ी यह कहने से नहीं चुकती
कि  कि बूढ़ा सठिया गया है,उससे सलाह ही कौन मांग रहा है । उसे दो जून की रोटी खाकर चुप बैठना चाहिए ? अब बताइए कि ऐसे में उस बुजुर्ग के ऊपर क्या बीतती होगी ?

रामायणमें भी यह प्रसंग आता है कि जब श्री भरतलाल जी सेना को साथ लेकर भगवान श्री राम से बन में मिलने जा
रहे थेतो बनवासियों को उनके ऊपर शंका हो गयी थी और उनके राजा निषादराज ने भरत जी से युद्ध तक करने की
तैयारी कर लीथी,परन्तु एक बड़े बुड्ढ़े की सीखसे युद्ध टल गया था ,और खून खराबा होने से बच गया था । लेकिन भाई साहब , आज जमाना बहुत बदल गया है । कोई भी ब्यक्ति अपने को दुसरे से अल्पबुद्धि मानने को तैयार नहीं है । और यही कारण है कि बुजुर्ग ब्यक्ति जहां हीनता से ग्रसित होता जा रहा है ,वहीँ ऐसे परिवार ,समाज या राष्ट्र बिखरते जा रहे हैं ,जहां बड़े बूढों को मान्यता नहीं दी जाती ।

अतः मेरा तो यही मानना है कि सभी को ,खासकर बड़े बूढों को अनचाहे सीख देने से बाज आना चाहिये ,इसी में उनकी भलाई है ।

हरिः ॐ तत्सत ।