सोमवार, अक्टूबर 13, 2014

माया के प्रपंच में इन्सान स्वतः को धोखा देता है दूसरों को नहीं ?

आज जिधर भी देखेंगे इन्सान रातोंरात करोड़पति बनने के चक्कर में वह सब कर रहा है जो उसे नहीं करना चाहिए । एक डाक्टर अपनी पहचान बनाने के लिये मरीजों के मजबूरी का फायदा उठाने से नहीं चुकता तो उधर एक वकील तमाम फरेबी दावपेच दिखाकर और अपने को न्यायाधीश के नजदीकी बताकर आरोपी का जितना शोषण कर सकता है करने से नहीं चुकता ,एक राजनीतिक पांच वर्षों के कार्यकाल में पांच पीढ़ी के लिए धन संचय करने से नहीं चुकता ,तो एक व्यापारी सारे अनैतिक तरीकों से धन बटोरने से नहीं चुकता ,तो एक कर्मचारी भ्रष्ट तरीकों से करोङों कमाने से नहीं चुकता । यह सब प्रपंच माया का ही प्रपंच है । लेकिन ऐसा करते वक्त वह कदापि नहीं सोचता कि वह दूसरों को नहीं बल्कि अपने आप को ही धोखा दे रहा है ?
कहा गया है कि आज हम जैसा भी जीवन जी रहे हैं या कर्म कर रहे हैं वह पूर्व जन्म की कमाई है वर्तमान जन्म की नहीं और आज हम जो भी करेंगे वह आगामी जन्म के खाते में जमा होगा अतः समझदार ब्यक्ति हमेशा सजग रहकर और सोच समझकर काम करता है ताकि अगला जन्म उसका अच्छा रहे । एक भाई अपने ही भाई का हत्यारा क्यों हो जाता है ,एक बाप अपने ही बेटे की हत्या क्यों कर देता है ,इसपर क्या कभी आपने चिंतन किया है ?यहसब पूर्व जन्म का संचित कर्म है जिसे हम चाहे अनचाहे करने को विवश होते हैं ।
भाइयों !मेरा आप से यही अनुरोध है कि इस बात को चिन्तन करें और समझने की चेष्टा करें कि वर्तमान जीवन में हम प्रारब्ध के द्वारा निर्धारित कर्म करने को विवश हैं लेकिन आनेवाला जन्म के हम रचयिता हैं अतः अपना भावी जन्म की रूपरेखा आज ही बनाना आवश्यक है ।
हरिः ॐ तसत । 

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