मनुष्य का जीवन एक पाठशाला है ,जहां उसके जन्म के साथ ,कुछ न कुछ सीखने का जो क्रम शुरू होता है ,
वह निरंतर उसके अवसान तक चलते रहता है । फिर भी उसे लगता है कि वह किसी भी विषय में पारंगत नहीं
हो पाया है । और आधा अधूरा छोड़कर ,उसे नई शुरुवात करने वापस लौट जाना पड़ता है । अंतिम समय
तक उसकी यही इच्छा बरक़रार रहती है कि यदि समय मिलता तो ,वह कुछ और अनुभव प्राप्त कर लेता ,लेकिन समय है कि किसी का इंतजार नहीं करता ?
सही मायने में यदि हम सोंचे तो सबको यही अनुभव होगा कि उसने जीवन में बहुत सारी गलतियां की हैं
और बाद में वह उसमे सुधार लाने का प्रयास भी किया है ,लेकिन फिर भी उसमें पारंगत नहीं हो सका ।
भूल और सुधार का यह क्रम जीवन में निरंतर चलता रहता है । लोग यह भी कहने से नहीं चुकते कि
घुड़सवार ही घोड़े से गिरता है और जिसने गिर जाने के डर से घोड़े की सवारी ही नहीं की ,उसे घुड़सवारी
का आनंद ही कैसे मिलता ?
इसी तरह एक मुहावरा जीवन में और भी सार्थक होता है । कहते हैं कि जब दांत है तब चना नहीं और
जब चना है तब दांत नहीं ?जीवन में आदमी को इसका सही अनुभव मिलता है । जीवन पर्यन्त आदमी ,
दिन रात मेहनत करके ज्यादा से ज्यादा धन अर्जित करता है ,और फिर परिवार को उनके
जीवकोपार्जन का जरिया दिलाने में मदद करता है, बाल बच्चों की पढाई लिखाई ,शादी ब्याह और फिर
नौकरी आदि दिलाने में अपना पूरा जीवन बिता देता है और सोचता है कि जिम्मेदारियां खत्म होने
के बाद आराम की जिंदगी बिताएगा ,तीर्थाटन करेगा और जीवन की अपूर्ण इच्छाओं को पूरा करेगा ,
लेकिन होता यही है कि तब तक उसका शरीर जवाब देने लगता है । भोजन भी ठीक से नहीं कर पाता ,
क्योंकि यातो उसके दांत गायब हो चुके हैं ,या फिर भोजन की हाजमा शक्ति उसमें नहीं रही अथवा
कई बीमारियां आ घिरी हैं जिसके चलते वह हरदम परेशान रहता है या फिर उसकी धर्मपत्नी का स्वास्थ्य
ख़राब रहता है जिसे छोड़कर घर से बाहर जाना संभव नहीं । इसी तरह तीर्थाटन की इच्छा तो है
पर शरीर में शक्ति नहीं है कि वह चल फिर सके और घर से बाहर निकल सके ।
अतः कहने का आशय यह है कि किसी भी कार्य को भविष्य के लिए टालना ही पहली गलती है ,हर काम के लिए
समय निर्धारित होता है और यदि समय टल गया तो समझो वह हमेशा के लिए टल गया । जीवन में
यदि हमने इस सच्चाई को जान लिया तो हमने सही मायने में जीवन जी लिया ?
हरिः ॐ तत्सत ।
वह निरंतर उसके अवसान तक चलते रहता है । फिर भी उसे लगता है कि वह किसी भी विषय में पारंगत नहीं
हो पाया है । और आधा अधूरा छोड़कर ,उसे नई शुरुवात करने वापस लौट जाना पड़ता है । अंतिम समय
तक उसकी यही इच्छा बरक़रार रहती है कि यदि समय मिलता तो ,वह कुछ और अनुभव प्राप्त कर लेता ,लेकिन समय है कि किसी का इंतजार नहीं करता ?
सही मायने में यदि हम सोंचे तो सबको यही अनुभव होगा कि उसने जीवन में बहुत सारी गलतियां की हैं
और बाद में वह उसमे सुधार लाने का प्रयास भी किया है ,लेकिन फिर भी उसमें पारंगत नहीं हो सका ।
भूल और सुधार का यह क्रम जीवन में निरंतर चलता रहता है । लोग यह भी कहने से नहीं चुकते कि
घुड़सवार ही घोड़े से गिरता है और जिसने गिर जाने के डर से घोड़े की सवारी ही नहीं की ,उसे घुड़सवारी
का आनंद ही कैसे मिलता ?
इसी तरह एक मुहावरा जीवन में और भी सार्थक होता है । कहते हैं कि जब दांत है तब चना नहीं और
जब चना है तब दांत नहीं ?जीवन में आदमी को इसका सही अनुभव मिलता है । जीवन पर्यन्त आदमी ,
दिन रात मेहनत करके ज्यादा से ज्यादा धन अर्जित करता है ,और फिर परिवार को उनके
जीवकोपार्जन का जरिया दिलाने में मदद करता है, बाल बच्चों की पढाई लिखाई ,शादी ब्याह और फिर
नौकरी आदि दिलाने में अपना पूरा जीवन बिता देता है और सोचता है कि जिम्मेदारियां खत्म होने
के बाद आराम की जिंदगी बिताएगा ,तीर्थाटन करेगा और जीवन की अपूर्ण इच्छाओं को पूरा करेगा ,
लेकिन होता यही है कि तब तक उसका शरीर जवाब देने लगता है । भोजन भी ठीक से नहीं कर पाता ,
क्योंकि यातो उसके दांत गायब हो चुके हैं ,या फिर भोजन की हाजमा शक्ति उसमें नहीं रही अथवा
कई बीमारियां आ घिरी हैं जिसके चलते वह हरदम परेशान रहता है या फिर उसकी धर्मपत्नी का स्वास्थ्य
ख़राब रहता है जिसे छोड़कर घर से बाहर जाना संभव नहीं । इसी तरह तीर्थाटन की इच्छा तो है
पर शरीर में शक्ति नहीं है कि वह चल फिर सके और घर से बाहर निकल सके ।
अतः कहने का आशय यह है कि किसी भी कार्य को भविष्य के लिए टालना ही पहली गलती है ,हर काम के लिए
समय निर्धारित होता है और यदि समय टल गया तो समझो वह हमेशा के लिए टल गया । जीवन में
यदि हमने इस सच्चाई को जान लिया तो हमने सही मायने में जीवन जी लिया ?
हरिः ॐ तत्सत ।
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