काफी लम्बे समय तक किसी नियम विशेष का अनुकरण ही परम्परा बन जाती है । जैसे शादिव्याह ,
मृतक कर्म,उपनयन संस्कार आदि आदि । ये परम्पराएं देश ,भाषा और धर्मं के अनुसार ही बंटे हुये हैं ।
हिन्दू परम्परा और मुस्लिम परम्पराएं अलग अलग होती हैं । एक देश की परम्परा जरुरी नहीं कि
दुसरे देश की परम्परा से मेल खाती हो ।
परम्पराओं पर देश ,काल और परीस्थिति का असर जरुर पड़ता है और इसी कारण परम्पराओं का स्वरुप
भी बदल जाता है । इसे हम एक उदहारण से समझ सकते हैं । हिन्दू धर्म में मृतक संस्कार करने का एक
अलग ही परम्परा है । लोग मृतक को पिंडदान करके और स्नान करके पांत में घर वापस लौटते हैं ,जो
कि आदिकाल से चला आ रहा है । परन्तु परिस्थिति इसे कैसे प्रभावित करती है इसे देखिये । पहले
लोग नदी, तालाब ,झरना आदि के करीब बसते थे और वहीँ पर पिंडदान आदि आसानी से हो जाते थे ,
लेकिन आज गाँव में तो यह संभव है ,परन्तु शहरों में यह परम्परा परिस्थिवश बदलती जा रही है ।
शहर में ना तो पांत में चलना संभव है ना ही पिंडदान कर पाना ,क्योंकि यहाँ तालाब अथवा नदी नहीं
मिलते और अगर हों भी पानी का अभाव रहता है । परिस्थिति ने यहीं पर परम्परा को बदल कर
रख दिया ।
इसी तरह पुराने ज़माने में शादीब्याह तय करना मांबाप या घर के बड़े बूढों का काम माना जाता था ।
वे अच्छे कुल ,गोत्र एवं परिवार को देख परख कर विवाह निश्चित करते थे और इसी कारण बर बधू
एक दुसरे को देख भी नहीं पाते थे जिसकी वजह से शादियाँ जीवन पर्यन्त निभते थे । लेकिन आज
आप किसी भी समाज को देख सकते हैं ,आज शादियां लड़के और लड़की की रजामंदी के बाद ही
तय हो पाते हैं । उनका कहना होता है कि मेरी शादी मेरी मर्जी के बगैर न की जावे । लेकिन देखने
में आता है कि ऐसी शादियां टिकाऊ नहीं होती । बहुत कम अन्तराल में ही पति पत्नी तलाक ले
लेते हैं । इधर परम्परा टूटी और उधर शादी भी टूट गई ।
मेरे कहने का आशय यही है कि परम्पराएं भी तभी तक कायम रहती हैं जब तक उसमें परिस्थिति की
मार नहीं पड़ती । परिस्थिति की मार परम्पराओं को जरूर प्रभावित करती हैं ।
हरिः ॐ तत्सत ।
मृतक कर्म,उपनयन संस्कार आदि आदि । ये परम्पराएं देश ,भाषा और धर्मं के अनुसार ही बंटे हुये हैं ।
हिन्दू परम्परा और मुस्लिम परम्पराएं अलग अलग होती हैं । एक देश की परम्परा जरुरी नहीं कि
दुसरे देश की परम्परा से मेल खाती हो ।
परम्पराओं पर देश ,काल और परीस्थिति का असर जरुर पड़ता है और इसी कारण परम्पराओं का स्वरुप
भी बदल जाता है । इसे हम एक उदहारण से समझ सकते हैं । हिन्दू धर्म में मृतक संस्कार करने का एक
अलग ही परम्परा है । लोग मृतक को पिंडदान करके और स्नान करके पांत में घर वापस लौटते हैं ,जो
कि आदिकाल से चला आ रहा है । परन्तु परिस्थिति इसे कैसे प्रभावित करती है इसे देखिये । पहले
लोग नदी, तालाब ,झरना आदि के करीब बसते थे और वहीँ पर पिंडदान आदि आसानी से हो जाते थे ,
लेकिन आज गाँव में तो यह संभव है ,परन्तु शहरों में यह परम्परा परिस्थिवश बदलती जा रही है ।
शहर में ना तो पांत में चलना संभव है ना ही पिंडदान कर पाना ,क्योंकि यहाँ तालाब अथवा नदी नहीं
मिलते और अगर हों भी पानी का अभाव रहता है । परिस्थिति ने यहीं पर परम्परा को बदल कर
रख दिया ।
इसी तरह पुराने ज़माने में शादीब्याह तय करना मांबाप या घर के बड़े बूढों का काम माना जाता था ।
वे अच्छे कुल ,गोत्र एवं परिवार को देख परख कर विवाह निश्चित करते थे और इसी कारण बर बधू
एक दुसरे को देख भी नहीं पाते थे जिसकी वजह से शादियाँ जीवन पर्यन्त निभते थे । लेकिन आज
आप किसी भी समाज को देख सकते हैं ,आज शादियां लड़के और लड़की की रजामंदी के बाद ही
तय हो पाते हैं । उनका कहना होता है कि मेरी शादी मेरी मर्जी के बगैर न की जावे । लेकिन देखने
में आता है कि ऐसी शादियां टिकाऊ नहीं होती । बहुत कम अन्तराल में ही पति पत्नी तलाक ले
लेते हैं । इधर परम्परा टूटी और उधर शादी भी टूट गई ।
मेरे कहने का आशय यही है कि परम्पराएं भी तभी तक कायम रहती हैं जब तक उसमें परिस्थिति की
मार नहीं पड़ती । परिस्थिति की मार परम्पराओं को जरूर प्रभावित करती हैं ।
हरिः ॐ तत्सत ।
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